संदेश

चौथ की रात

चांद तारे आसमां में होंगे , हम - तुम इस जहां में होंगे  रातों की सौगात होंगी , तेरी - मेरी आंखों  ही आंखों में बात होंगी ।  दीये की रोशनी आंखों में जग मगाएंगी फ़िर बीते लम्हों कि याद दिलाएगी चौथ पर ये चांद   नट - खट रूप दिखलायेगा बादलों में छुपता  नज़र आएगा। चांदनी रात में सखियों के साथ में , चांद निकलने की आश में पलकें बिछाएं प्यास में चांद निकलने की आश में , हम तुम एक साथ में । आयु हो पिया की उतनी, दीपशिखा में रोशनी जितनी जन्म - जन्मों तक साथ हो , हर जनम में मिलनें की  आश हो , चौथ से मांगू यही दूआ आख़री सांस तक तू मेरे पास हो ।                                                    ~Deepshikha Jha                                         

*अपना गांव*

वो अपना गांव ,वो पीपल की छांव त्योहारों पर लगता मेला, कुल्फी और चाट का सजता ठेला  यादों में घूमता पहिया जैसे गांव के मेंलों का झूला । वो बड़ों का हाथ,वो साथियों का साथ खुशियों भरा वों रंग जैसे मेलों में गुब्बारों का संग, मंच पर सजते स्वरूप जैसे जीवन बदलता पल - पल में रूप। वो बचपन के खेल , बिछरों का मेल दूर देश में मेरा मन, ढुंढ रहा अपना बचपन शहरों का जीवन,स्वार्थ भरा है हर मन सभी यहां मतलब के नाते कोई किसी को  नहीं हैं भाते। भाई - बहने पड़ोसी लगते,अपने में गुम मदहोशी लगते, कैसा हैं ये जीवन खोया - खोया रहता हैं मन, वो अपना गांव ,वो पीपल की छांव , त्योहारों का मेला जहां  कभी था अपना बसेरा ।                                                    ~Deepshikha jha

Death of justices

Standing up to front of my eyes the life how to compare of things to make easy  What you write didn't think of my side You can't wait my time  I tell about a lie of society why are you cry.  the truth of life people thought in side for poltics in society's politics to self income. politics for name and fame or reputation . Doesn’t matter if any other in ache and grief Doesn’t matter life and death don't matter to them who lived poor and helpless In condition  They only stand on selfishness. can you understood lord voice of selfishness.  have took time of Straighten your owl Naither increased unity of justices nor  The violence in their country for stop know.                                       ~Deepshikha jha

स्वार्थ और राजनीति

सामने आकर खड़ी हो गई कैसे "राजनीति ज़िन्दगी से बड़ी हो गई" सुनो! रुको जरा बात कोनसी बड़ी हो गई। क्या कहें जनाब ! दुःख ना दर्द ना शोक बची ना पीड़ा बेच रहें हैं "समाचार" जगत में मेरे ह्रदय का चीरा - चीरा। जहां होतें अन्याय के साएं "राजनीति" वहां हैं पंख फैलाए चिर हरण करने वाले घूम रहे बिन खोफ के साएं  संगिध शव है आश लगाए न्यायिक भोर कब मुक्ति पाएं  ज़िन्दगी यहां जिंदा जलाते ,ज़मीर यहां पर बिक जाते।   स्वार्थ जहां कहीं दिख जाते ,वहां से आबाजे बुलन्द है आतें, न्याय की गुहार अब कहां लगाएं, न्याय तो अब मंडी के ठेलों पर नज़र डालें , "राजनीतिक" सब मेल  जीवन मनो जैसे कोई खेल है ।  लोकतंत्र में लोग सत्ता धारी बनें हैं, जैसे  देश"भारत" में बीमारी लगें हैं शिर्फ़ कुर्सी की होड़ हैं ,अन्याय मचा घन - घोर हैं।                          ~दीपशिखा झा 

"पर्दे के पीछे"

जिनकी कहानी लिखते थे , जिनके क़िस्से सुनते थे जिनको आदर्श मान कर,उनके पथ कदम पर चलते थे उनको भी आज देखा धूंआ में सुलगतें हुए । जो कभी देश के गौरव में सामिल थे,जिनके दरवाजों पर पत्रकारों के डेरे थे, नाम जिनका ले- ले कर लोग नसीहत देते थे, देखा उनके खिड़की पर आज सन्नाटें को घेरे हुए।   जगमगाते चेहरे राज़ इनमें छुपाएं हुए गहरे ना जानें कितने ढूबें हैं मायानगरी के मयाबी समंदर में, सितारों की दुनियां में ना जाने कितने अंधरे हैं बिखेरे हुए। पर्दे पर देखती जब मैं आदर्श किरदारों की कहानी मन में ही सोचती इस बात से अनजानी "पर्दे की लेखनी" हैं ख़ुदा से बेहतर कहानी , नादान थी पर्दों में छिपी बे पर्द  लोगों की कहानी ।                               ~ Deepshikha Jha

*जीवन में गुरु*

तारीफ़ करू क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया  हर बार गिरती रहीं मैं तुमने उठना सिखाया। मिट्टी सी ढेर परी थी तुमने "ज्ञान गंगा" भर घड़ा* बनाया  राहों में काटें बोहोत थे पैरों में छाले पड़े थे हर मुश्किल राहों पर चलना सिखाया। तारीफ़ करू क्या उसकी जिसने तुम्हें ......! नौ रूप देवी के दुनियां में तेरा रूप अनेक है कभी "माँ"  कभी "पिता" कभी "शिक्षक" कभी "शिक्षिका" बनी, आनेको रूप में एक "उद्देश्य" छिपा है "शिक्षा का संदेश" दिखा हैं ।  अल्फाजों में कहूं गुस्ताख़ी होगी, इतनी गुनाह की माफ़ी होंगी "गुरु की ज्ञान सागर से कुछ बूंदें उधार रख लूं"  कैसे तेरा शुक्रगुजार करूं सिर्फ इतनी सी फ़रियाद सुनो तारीफ़ करू क्या उसकी जिसने तुम्हें .....!                                 ~ Deepshikha Jha

" Feel every silence"

Where "Thou" live "You" don't know  My "Soul" surrounding you. When you Breathe You couldn't "See"  me, In front of Your eyes. But my fragrance reaches To you with every breeze. If  you saw  The mountain And summons your beloved, But  every sound returned  are silence give  My name deep In your Ears .                                                                ~Deepshikha  Jha