संदेश

* ए वतन *

 ए मेरे वतन ये "तीन रंग" रहता हमेशा शान से लहराता हुआ हवाओं  में बातें करें आसमान से। तिरंगा ए इश्क़ मेरे वतन ,"चूनर" बनाके ओढ़ लूं  शान से रखूं सिर अपने ,जब चाहें ये "कफ़न" बने। केसरिया रंग हो उस"सिंदूर"का जो माथे पर सजे मेरे "माँ" कहलाऊं उस वीर का जो "देश" पर अपने मीटें। शांति का दूं "संदेश" मैं "सफ़ेद" वस्त्र पहनें हुए  "गर्व" से मर जाऊं मैं, ओढ़कर "तीन रंग" ये। ए मेरे वतन ये "तीन रंग" बसी इसमें जान है यही "गौरव" हैं "देश" का यही हमारी शान हैं ।                                    ~Deepshikha Jha  

~ खुबसूरती एक पिंजड़ा~

ए ख़ुदा अल्फ़ हैं तेरा या गुनह ए इश्क़ है किया    इस ज़ीनत जैसे चेहरा में क़ैद कर दिया । हर किसी की नज़र में  सपना बन जाती हूं  एक  प्रश्न  है  तुझ  से क्या किसी का अपना बन पाती हूं। सुनती हूं बचपन से खुबसूरती के क़िस्से  हर शख़्स कहते जिंदगी आसान इसके हिस्से ।  पिंजड़े में क़ैद पनक्षी खुशनुमा महसूस करता है  नज़रो में क़ैद रहना एक गुनाह सा लगता है। जूर्म कर जाता ये सूरत मेरा सीरत और काबीलियत   छिप जाता  इसके पीछे जब सामने रहता हैं सूरत  मेरा ।                                  ~Deepshikha Jha

*चार लोग*(एक सोच)

"चार लोगों" क्या कहेंगे इस सोच में चंद ज़िंदगियां बिखर जाया करती हैं, लेकिन उन "चार लोग" की खोज कभी ना हुईं ना होगी कभी । जिन "चार लोगों"से हम परेशान रहा करतें हैं, सच तो ये है उन्हें भी वही "चार लोग" परेशान करते है। क़सूर उन "चार लोगों" में या क़सुर हमारे सोच में एैसे ख्याल कभी आते ही नहीं, क्या बन्दी हैं हम "चार लोग" के या "चार लोग" बन्दी बने है तुच्छ सोच के । "चार दिन"की ज़िंदगी"चार लोगों" के लिए जिया करतें है, वो"चार लोग"जो मिलते नहीं उनका बोझ उठाएं फिरते हैं । "चार दिन" की जिंदगी जिलों अपने लिए, चंद पल खुशी के रखलो अपने लिए, चंद ख़ुशीयां बांट लोंं वहीं "चार लोग" याद रखतें हैं, मानसिकता के बीमार हम "चार लोग" की शिकायत करते हैं ।                                      ~ Deepshikha jha  

* एक हसरत *

इतनी सी हसरत* है मेरी आफ़ताफ* बनूं आंखों की तेरी गुज़ारिश* करूं ख़ुदा से इतनी कि सिमटी रहूं पलको में तेरी इतनी सी हसरत है मेरी.......! गर छलक जाऊं बनकर आंसू कभी मेरी ख़ता ये माफ़ कर दे, जब गीरूं तेरी आंचल पर फिर से समेट रख लें,   इतनी सी हसरत है मेरी .... ...! असफ़ार*करूं इन अखियों से ही कि इनकी अमानत बन जाने दें आरज़ू* करूं इतनी सी आबरू* बस जानें दें मेरी  इतनी सी हसरत है मेरी .......!                                       ~Deepshikha Jha *हसरत - ख्वाइश * आफ़ताफ  -  सूर्य *गुज़ारिश - आग्रह *असफ़ार- यात्रा करना *आरज़ू - इच्छा *आबरू - इज्ज़त 

दिल बेचारा

मासूम नदियां ,जल की धारा पवन के झोंके  ना कोई किनारा ये "दिल बेचारा"! नहीं आता रुकने का ठिकाना,  आता बस झुकने  का बहाना।  दरिया ऐसा सब डुबो देता हैं  वारिश  की तरह भिगो देता है। कोईअछूता नहीं इसकी  कहर से  "बेचारे दिल"की शहर से ।    वो तेरे पास वो मेरे पास भी  एक सब का प्यारा "दिल बेचारा"।                                   ~ दीपशिखा झा

# सायरी#

इस दुनियां में बोहोत से ऐसे लोग हैं जो आपके मित्र होने का दावा करते हैं, लेकिन मुश्किल हालात में सिर्फ आपकी "परछाई" ही आपके साथ होती हैं ~Deepshikha  उलझ जाओंगे जुल्फों के नरम छांव तले, की खुद को मुझ से रिहा कर लो ~दीपशिखा जब आप किसी के साथ पूरी सिद्दत और सच्चाई से जुड़ते हैं, तब आप अपनी मन की आंखों से वो भी देख पाते हैं जो एक खुफिया कैमरे कभी नहीं देख सकता ~Deepshikha इश्क़ अक्सर बाबला बना देता है, बेवकूफी से दूरी बेहतर वे वक़्त की आवाज़ नहीं जब पुकारो आजाऊंगी वो वारिश नहीं जो किसी पे बरस जाऊंगी ,तुम सागर की लहरों जैसे देखते रह जाओगे मैं इस क़दर मूड़ जाऊंगी ~दीपशिखा #Goodevening   पीछे आऊ तेरे क्यूं अपना सा लगता है, तेरी हर  एक बात सपना सा लगता है ~Deepshikha 🤗

~एक रात~

कैसी ये रात है ना तेरी -  मेरी बात है दूरियां सिमटी है तन्हाई में ना वो लम्हें  ना वो बरसात है ना तेरी - मेरी बात है ।   कैसी ये रात है ना तेरी हंसी की शोर ना  वो मज़ाक जैसे नाचता मोर हर तरफ़ रात ही रात है ना तेरी - मेरी बात है ।  कैसी ये रात है ना कोई शिकवा ना शिक़ायत है ना तेरी माफ़ी की गुज़ारिश खामोश सारे अल्फ़ाज़ है ना तेरी - मेरी बात है।                                 ~Deepshikha jha