संदेश

स्वार्थ और राजनीति

सामने आकर खड़ी हो गई कैसे "राजनीति ज़िन्दगी से बड़ी हो गई" सुनो! रुको जरा बात कोनसी बड़ी हो गई। क्या कहें जनाब ! दुःख ना दर्द ना शोक बची ना पीड़ा बेच रहें हैं "समाचार" जगत में मेरे ह्रदय का चीरा - चीरा। जहां होतें अन्याय के साएं "राजनीति" वहां हैं पंख फैलाए चिर हरण करने वाले घूम रहे बिन खोफ के साएं  संगिध शव है आश लगाए न्यायिक भोर कब मुक्ति पाएं  ज़िन्दगी यहां जिंदा जलाते ,ज़मीर यहां पर बिक जाते।   स्वार्थ जहां कहीं दिख जाते ,वहां से आबाजे बुलन्द है आतें, न्याय की गुहार अब कहां लगाएं, न्याय तो अब मंडी के ठेलों पर नज़र डालें , "राजनीतिक" सब मेल  जीवन मनो जैसे कोई खेल है ।  लोकतंत्र में लोग सत्ता धारी बनें हैं, जैसे  देश"भारत" में बीमारी लगें हैं शिर्फ़ कुर्सी की होड़ हैं ,अन्याय मचा घन - घोर हैं।                          ~दीपशिखा झा 

"पर्दे के पीछे"

जिनकी कहानी लिखते थे , जिनके क़िस्से सुनते थे जिनको आदर्श मान कर,उनके पथ कदम पर चलते थे उनको भी आज देखा धूंआ में सुलगतें हुए । जो कभी देश के गौरव में सामिल थे,जिनके दरवाजों पर पत्रकारों के डेरे थे, नाम जिनका ले- ले कर लोग नसीहत देते थे, देखा उनके खिड़की पर आज सन्नाटें को घेरे हुए।   जगमगाते चेहरे राज़ इनमें छुपाएं हुए गहरे ना जानें कितने ढूबें हैं मायानगरी के मयाबी समंदर में, सितारों की दुनियां में ना जाने कितने अंधरे हैं बिखेरे हुए। पर्दे पर देखती जब मैं आदर्श किरदारों की कहानी मन में ही सोचती इस बात से अनजानी "पर्दे की लेखनी" हैं ख़ुदा से बेहतर कहानी , नादान थी पर्दों में छिपी बे पर्द  लोगों की कहानी ।                               ~ Deepshikha Jha

*जीवन में गुरु*

तारीफ़ करू क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया  हर बार गिरती रहीं मैं तुमने उठना सिखाया। मिट्टी सी ढेर परी थी तुमने "ज्ञान गंगा" भर घड़ा* बनाया  राहों में काटें बोहोत थे पैरों में छाले पड़े थे हर मुश्किल राहों पर चलना सिखाया। तारीफ़ करू क्या उसकी जिसने तुम्हें ......! नौ रूप देवी के दुनियां में तेरा रूप अनेक है कभी "माँ"  कभी "पिता" कभी "शिक्षक" कभी "शिक्षिका" बनी, आनेको रूप में एक "उद्देश्य" छिपा है "शिक्षा का संदेश" दिखा हैं ।  अल्फाजों में कहूं गुस्ताख़ी होगी, इतनी गुनाह की माफ़ी होंगी "गुरु की ज्ञान सागर से कुछ बूंदें उधार रख लूं"  कैसे तेरा शुक्रगुजार करूं सिर्फ इतनी सी फ़रियाद सुनो तारीफ़ करू क्या उसकी जिसने तुम्हें .....!                                 ~ Deepshikha Jha

" Feel every silence"

Where "Thou" live "You" don't know  My "Soul" surrounding you. When you Breathe You couldn't "See"  me, In front of Your eyes. But my fragrance reaches To you with every breeze. If  you saw  The mountain And summons your beloved, But  every sound returned  are silence give  My name deep In your Ears .                                                                ~Deepshikha  Jha

~ दूरियां~

दूर से ढोल के धुन सुहावने लगते हैं, दूर के रिश्ते जमानें तक चलते हैं।  दूर से जंगल मनभावने लगते हैं, पास जानें पर डरावने  लगते हैं। कहते सुना है कि दोस्ती दूर सेअच्छी होती हैं, सच्चा प्यार अक्सर दूर हो जाय करतें हैं। दूर से कोयल की कूक प्यारी लगती हैं, दूर शीशे के दरवाज़े से वारिश निराली लगती हैं। दूर से आसमान हसीन लगतें है, सपने हक़ीक़त से रंगीन लागतें हैं। दूर संगीत की गूंज मधुर लगती हैं, जमीं से फ़लक की दूरी जंचति हैं। अब दूरियां बढ़ रही दरवीयां तो मायूसी कैसी चाहत तो यही थी अब ये ख़ामोशी और शिकायत कैसी , चाहत तो यही थी जो पूरी हुई हैं।                             ~Deepshikha Jha

* बे रहम दुआ *

दूरियों की दुआ मांग रहे जो कभी , सूनली खुदा ने अर्जी अब उनकी  रिश्तों से रिश्तों को दूर किया है। मां को बच्चे ,पत्नी को पति,  हर शख़्स को मजबूर किया है। इंसान को इंसानियत से दूर किया है। जो हाथ गिरने पर उठाने,जो दूसरों के आसुं पोछा करते थे जो भूखे को भोजन  और जरूरत मंद का सहारा बना करते थे वो आगे बड़ने से हिचकिचाने लगे अब । मजदूर से मजदूरी को दूर किया है। जिनको कभी पल भर की फुर्सत नहीं थी अपनों के साथ बैठने की वो थक गए मायूस और लाचार  चेहरों की रौनक लौटने को तरस रहे। नाम से नाम को दूर किया है। इस मौसम ने देखो कितनो को  मजबूर किया है। कोई नाम बनाने को मिटता था कभी ये कैसा दिन  आया है कई हस्तियों की कश्ती डूब गई ये कौनसा दौर नया लाया है।                            ~Deepshikha Jha 

*मेरी किताब*

मैं नहीं जानती कभी मुझे पहचान मिलेगी या नहीं मिलेगी मैं रोज़ अपनी ज़िन्दगी से सीखकर नई शुरुआत लिखतीं हूं मैं अपनी  किताब लिखतीं हूं । बे कस* ज़िन्दगी से चुराकर जस्बात  अपनी रोज़ नई अल्फ़ाज़* लिखतीं हूं  मैं अपनी किताब लिखतीं हूं। अदीब* नहीं मैं बे फ़िक्र कि तुम मुझे पढ़ा करों फिर रोज़ नई अज़ल*आगाज़ लिखतीं हूं मैं अपनी किताब लिखतीं हूं। *अकेला *शब्द *विद्वन *कभी ना मिटने वाला                             ~Deepshikha Jha