एक चांद है फलक पर देखती मैं भी हूं देखतें तुम भी हो"तुम मुझ से जुदा कैसे हो"। मंजिल अलग है एक राह अकेली है उन्हीं राहों से गुजरती मैं भी हूं गुजरतें तुम भी हो "तुम मुझ से जुदा कैसे हो"। एक आशियाना है खुदा का जहां पर मैं भी हूं वहां पर तुम भी हो " तुम मुझ से जुदा कैसे हो"। ~Deepshikha Jha
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*सुशांत*
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मन "आशांत" ,नाम " सुशांत" था तू भीड़ में "एकांत" था गांव "पूर्णिया" ,"पटना" बासी ,निर्मल गंगा तेरे "राख"की प्यासी । "महानगर" ने तुमको "मोहा", चमक - दमक ने तुमको "तोड़ा", तन्हा होकर "जीवन"से फ़िर तू अपना मुंह "मोड़ा"। "जीवन" का "सुख" छोड़ गया, सब "नाता- रिश्ता"तोड़ गया, अपनों को "तन्हा" छोड़ गया ,चाहने वालों का "दिल" तोड़ गया। ज़िक्र करू कैसे तेरे " श्र्वन" का आंख से "टप-टप" छलके "मोती", एक "बेजुबान" संसार में छोड़ गया। ~ Deepshikha Jha
अमिताभ
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नभ में तैरता एक "सितारा" हैं आप । हर आंख में टीम - टीम करता "तारा" है आप। एक चांद "आसमां" में एक चांद हैं "जमी" पर। "सूरज" सा तेज़ बिखेरता "मुस्कान" है यही पर । नदियों की लहरें उठकर देती "सलामी" जिसको "पवन" के झोंके अक्सर जुल्फें सबरें "उनके"। पंझी ,बहारें आकर धुन सुनती "जिनको", देखकर "विनम्र" उनको झुक जाती फूलों की डाली। मंदिर में बसी "मूरत" लगती हैं उनकी सूरत । जो मिट ना सके वो "निशान" है "विनम्रता" की पहचान है "नम्र" रहकर जोड़े हाथ सभी को इतने " प्रतिभावान" है " अमिताभ" कहते लोग उन्हें वहीं " ख्यतिवान" हैं। ~ Deepshikha Jha
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मिले हैं आज तो कल की फ़ीकर मत करना, कल मिलू ना मीलू इसका ज़िक्र भी मत करना । याद आऊं तो मुस्कुरा देना,रो कर कहीं भूल ना जाना। तस्वीर देख "गिला" ना करना, ज़िन्दगी लंबी नहीं बड़ी थी ये याद रखना। मेरी "शखसीयत" ना मिटा पाओगें,चाहें जितना जोर लगाओगे। मैं मन से "जिया", मन से "मरा" और कितना आजमाओगें ,मिटाना सकोगें नाम मेरा शांत मन में एक "सुशांत"पाओगे । ~Deepshikha jha