संदेश

* एक हसरत *

इतनी सी हसरत* है मेरी आफ़ताफ* बनूं आंखों की तेरी गुज़ारिश* करूं ख़ुदा से इतनी कि सिमटी रहूं पलको में तेरी इतनी सी हसरत है मेरी.......! गर छलक जाऊं बनकर आंसू कभी मेरी ख़ता ये माफ़ कर दे, जब गीरूं तेरी आंचल पर फिर से समेट रख लें,   इतनी सी हसरत है मेरी .... ...! असफ़ार*करूं इन अखियों से ही कि इनकी अमानत बन जाने दें आरज़ू* करूं इतनी सी आबरू* बस जानें दें मेरी  इतनी सी हसरत है मेरी .......!                                       ~Deepshikha Jha *हसरत - ख्वाइश * आफ़ताफ  -  सूर्य *गुज़ारिश - आग्रह *असफ़ार- यात्रा करना *आरज़ू - इच्छा *आबरू - इज्ज़त 

दिल बेचारा

मासूम नदियां ,जल की धारा पवन के झोंके  ना कोई किनारा ये "दिल बेचारा"! नहीं आता रुकने का ठिकाना,  आता बस झुकने  का बहाना।  दरिया ऐसा सब डुबो देता हैं  वारिश  की तरह भिगो देता है। कोईअछूता नहीं इसकी  कहर से  "बेचारे दिल"की शहर से ।    वो तेरे पास वो मेरे पास भी  एक सब का प्यारा "दिल बेचारा"।                                   ~ दीपशिखा झा

# सायरी#

इस दुनियां में बोहोत से ऐसे लोग हैं जो आपके मित्र होने का दावा करते हैं, लेकिन मुश्किल हालात में सिर्फ आपकी "परछाई" ही आपके साथ होती हैं ~Deepshikha  उलझ जाओंगे जुल्फों के नरम छांव तले, की खुद को मुझ से रिहा कर लो ~दीपशिखा जब आप किसी के साथ पूरी सिद्दत और सच्चाई से जुड़ते हैं, तब आप अपनी मन की आंखों से वो भी देख पाते हैं जो एक खुफिया कैमरे कभी नहीं देख सकता ~Deepshikha इश्क़ अक्सर बाबला बना देता है, बेवकूफी से दूरी बेहतर वे वक़्त की आवाज़ नहीं जब पुकारो आजाऊंगी वो वारिश नहीं जो किसी पे बरस जाऊंगी ,तुम सागर की लहरों जैसे देखते रह जाओगे मैं इस क़दर मूड़ जाऊंगी ~दीपशिखा #Goodevening   पीछे आऊ तेरे क्यूं अपना सा लगता है, तेरी हर  एक बात सपना सा लगता है ~Deepshikha 🤗

~एक रात~

कैसी ये रात है ना तेरी -  मेरी बात है दूरियां सिमटी है तन्हाई में ना वो लम्हें  ना वो बरसात है ना तेरी - मेरी बात है ।   कैसी ये रात है ना तेरी हंसी की शोर ना  वो मज़ाक जैसे नाचता मोर हर तरफ़ रात ही रात है ना तेरी - मेरी बात है ।  कैसी ये रात है ना कोई शिकवा ना शिक़ायत है ना तेरी माफ़ी की गुज़ारिश खामोश सारे अल्फ़ाज़ है ना तेरी - मेरी बात है।                                 ~Deepshikha jha

एक चांद है फलक पर देखती मैं भी हूं  देखतें तुम भी हो"तुम मुझ से जुदा कैसे हो"। मंजिल अलग है एक राह अकेली है उन्हीं  राहों  से गुजरती मैं भी हूं गुजरतें तुम भी हो "तुम मुझ से जुदा कैसे हो"। एक आशियाना है खुदा का जहां पर मैं भी हूं वहां पर तुम भी हो " तुम मुझ से जुदा कैसे हो"।                                                  ~Deepshikha Jha

#मै#

कोई अपना कहां मिला इस जहां में , मै भटकती रही हूं आसमां में। सब अपना - अपना कह जाते हैं हम यूं ही तन्हा रह जाते हैं। मुझसे नहीं "मैं" से जोड़ते हैं नता "मै" मिले,जहां फिर कुछ नहीं उन्हें भाता । यारी, दुनियां - दारी, मां - बाप सिर्फ नाम के शोहरत - रुतबा है काम के ।                                                      Deepshikha Jha

~तनहाई~

तनहा था तनहाई थी ,बात लबों तक ना आईं थी आज पूछे सब तेरे लिए ,पूछा ना होगा तेरी तनहाई तू मंद मंद मुस्कान बिखरे ,छिपाता रहा अपनी तनहाई   सरा जग सुना हुआ