संदेश

~प्रकृति ~

आओ एक पेड़ लगते हैं ,प्रकृति को सुंदर बनाते है  एक कसम ये खातें हैं होने ना देंगे अब इसे दूषित   "प्रदूषण"आजसे मिटाते हैं आओं  एक पेड़ लगते हैं प्रकृति को सुंदर बनाते हैं। प्रकृति ही "भगवान्"हैं जिससे हम अनजान हैं  नहीं रखता ये बैर किसी से हम सभी संतान हैं जिसके "प्रकृति"को संजोए आज, नया चलो कुछ"बोएं"आज आओं एक पेड़ लगते हैं प्रकृति को सुंदर बनाते हैं । प्रथ्वी का सम्मान करें ,जीवन "जल"का ध्यान धरे, पशु - पक्षी खाद्य - जाल बिछा दी,जिसने उसका  कुछ ऋण चूकते हैं आओं एक पेड़ लगते हैं  प्रकृति को सुंदर बनाते है। ~                                 Deepshikha jha

"कोरोना"

 कोरोना का कहेर हैं ये समशान बना शहर है ये   सड़क हैं सूनसान पड़ा , मनुष्य है वेजान परा "।                                 जीवन है अनजान बना ,                                 पशुओं का पहचान बड़ा ।     अपने " अपनों से अनजाने है ,          सारा "जग" ही बेगाने हैं ।         निर्मल हुईं "गंगा "कि काया, ना जाने यह कोनसा साया।    विचित्र , बना विनाश हैं ये पृथ्वी ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌पर सर्वनाश ये ।                                देवों का स्वराज हूआ "                                              मन्दिर ,मस्जिद आज़ाद  हूआ।    गिरीजा घर भी सुना है, गुरुद्वारा...

" कोरोना" (भय पर विजय)

भय ना हो भयभीत ना हो ,भय को आओ जीत भी लो  विकार  उत्पन्न  हैं जो  मन में विचारो से शुद्ध करो   ................भय को आओ जीत भी लो । प्रकृति को  तुम स्वीकार करो भय का ना विस्तार करो  परिस्थिति हैं  जो स्थिति उसको तुम मजबुर करो   ...............भय को आओ जीत भी लो । महामारी एक बीमारी हैं इसकी  कुछ तैयारी हैं , महफूज रहना जरूरी है इसलिए थोड़ी दूरी , तन्हाई को दूर करो  ................. भय को आओ जीत भी लो । झुकता सिर जिसके"दर"* के आगे कह दो उसको हाथ उठाके,  हम नहीं घबराएंगे अगर यही मंजूर "तुझे" *"तो तेरे घर भी आएंगे" , मन अपना मजबूत करो  ................. भय को आओ जीत भी लो । *1 भगवान का घर  *भगवान                                            ~Deepshikha Jha 

"चेहरा"

सजाते हैं "चेहरा" बनाते हैं "चेहरा" कभी दिखाते कभी छुपाते हैं "चेहरा ", ना जाने कितने राज हैं इसमें  चेहरे पर लगते हैं चेहरा  ।                         "चेहरे" में क्या खास हैं चर्चे इसके                                 दिन - रात हैं  कभी  पड़ते हैं                                      चेहरा तो कभी लिखते हैं                                              चेहरा....।               ना जानें इस "चेहरे" पर कितने है पहरा       बनाते हैं चेहरा मिटाते हैं चेहरा,       अक्सर याद भी आते हैं चेहरा.... ।             ...

~यारी~

अल्फ* ए यारी वफाएं सारी ये दुनियां दारी फ़िज़ूल है इल्म* तेरा कबूल किया अंजाने  तुझे दूर किया ए अजनबी तुझे क्यों फ़िर मंजूर किया    तेरी आदा निराली , इल्लत* इलान* है   तेरी सूरत ए ना जाना ,तेरे ईमान याराना   तेरी मायूसी* ही उल्फत* है, खुशियों को तेरी जरूरत है तू अब्द* नहीं किसी सुंदरता का तेरा अ‌‌त्र* मन ही प्रभात है ,आरा * ना कोई सच्चे मन का , दर्पण तेरा विश्वास हैं    तू रख वक़्त पर ऐतबार जरा , खुदा एक पाक हैं            1.भेट 2 ज्ञान 3.कमी 4.बताना 5.उदासी 6. परेशानी 7.दास  8.सुगन्ध  9.सजावट   ~Deepshikha Jha ✍️🤗  M

~ तेरा पता~

कितने मिले इस जहां पर, कितने मिले आसमान पर , तेरा पता ढूंढू कहां ,तू हैं किस मकाम पर  अपना पता सब भूलकर , ढूढ़ती तुझे ए बेखबर रातों को यू बेसब्र ,दिन कि कहां मुझ को हैं फीकर सुबह से लेकर शाम तक ढूंढ़ती तुझो ये नज़र कहां छुपा है बेखबर बनाकर मुझे अपना हमसफ़र कहां छुपा है बेखबर  बनकर यूं अनजान तू ,बैठा है आराम से तुझको नहीं कोई खबर कहां छुपा है बेखबर ....! तेरा पता ढूंढू कहां ,तू हैं किस मकाम पर                                                                                         ~ Deepshikha Jha                                  

~ माँ~

                    कैसे  कहूं  क्या  हो  "तुम"            नदी की रेत के साथ पवन की बहती            हुई धारा  हो"तुम ",सागर में जो।  पाप              निथर जाएं  ऐस  किनारा  हो "तुम"।                    कैसे   कहूं   क्या  हो  "तुम"      अनजान गली के मोड़ पर जो मिल जाएं      वहीं  सहारा हो "तुम", आंधियारों में मिली      " दीए "की रोशनी जैसी उजाला हो "तुम"               कैसे   कहूं   क्या हो  "तुम"        सर्दियों में  चाय की प्याली सी प्यारी हो        "तुम",बड़ी न्यारी हो "तुम", बगों में              खिले  फूलों कि क्यारी हो "तुम" ...